जनतंत्र, मध्यप्रदेश, श्रुति घुरैया:
भारत पिछले तीन वर्षों से रूस से 5 से 30 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर कच्चा तेल खरीद रहा है। इस सौदे का सीधा लाभ मुख्य रूप से देश की बड़ी सरकारी और निजी रिफाइनरी कंपनियों को मिला है—जिनमें रिलायंस इंडस्ट्रीज, नायरा एनर्जी, इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम शामिल हैं। उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, इस डिस्काउंट का लगभग 65% हिस्सा इन कंपनियों के पास गया, जबकि सरकार को लगभग 35% का लाभ मिला। लेकिन आम उपभोक्ता तक यह फायदा नहीं पहुंच पाया।
दरअसल, भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें कागज पर डी-रेगुलेटेड जरूर हैं, लेकिन उनका वास्तविक नियंत्रण अब भी सरकार और तेल कंपनियों के पास है। सरकार के लिए ईंधन पर लगने वाला टैक्स एक स्थिर और भरोसेमंद राजस्व स्रोत है। वर्तमान में केंद्र सरकार पेट्रोल पर 13 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी वसूलती है, जबकि राज्य सरकारें वैट (VAT) लगाती हैं। नतीजतन, पेट्रोल की खुदरा कीमत का लगभग 46% और डीजल का 42% हिस्सा टैक्स में चला जाता है। केवल टैक्स से केंद्र को सालाना लगभग 2.7 लाख करोड़ रुपये और राज्यों को 2 लाख करोड़ रुपये की कमाई होती है। अप्रैल 2025 में एक्साइज ड्यूटी में 2 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी से केंद्र को अतिरिक्त 32,000 करोड़ रुपये की आय हुई। ऐसे में सस्ते तेल से मिली बचत को आम जनता तक पहुंचाने की बजाय सरकार और कंपनियां इसे अपने मुनाफे और राजस्व में जोड़ रही हैं।
रूस से तेल आयात का असर कंपनियों के मुनाफे में साफ दिखा है। 2022-23 में इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम का संयुक्त लाभ 3,400 करोड़ रुपये था, जो 2023-24 में 25 गुना बढ़कर 86,000 करोड़ रुपये हो गया। हालांकि 2024-25 में यह घटकर 33,602 करोड़ रुपये रहा, लेकिन यह अब भी 2022-23 के मुकाबले कई गुना ज्यादा है। निजी क्षेत्र की रिफाइनरियां—रिलायंस और नायरा—ने भी भारी मुनाफा कमाया। इनका रिफाइनिंग मार्जिन क्रमशः 12.5 डॉलर और 15.2 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।
केपलर एनालिटिक्स के अनुसार, 2025 की पहली छमाही में भारत ने रूस से 23.1 करोड़ बैरल तेल आयात किया, जिसमें से 45% हिस्सा केवल रिलायंस और नायरा का था। 2022 में इनकी संयुक्त हिस्सेदारी सिर्फ 15% थी। यह तेल केवल घरेलू खपत के लिए नहीं था, बल्कि इसका बड़ा हिस्सा रिफाइन कर अमेरिका, यूरोप, यूएई और सिंगापुर जैसे बाजारों में बेचा गया। 2025 की पहली छमाही में इन कंपनियों ने लगभग 6 करोड़ टन रिफाइंड प्रोडक्ट्स निर्यात किए, जिनमें 1.5 करोड़ टन यूरोपीय संघ को बेचे गए, जिसकी कीमत करीब 15 अरब डॉलर रही।
रूस से सस्ते तेल का सिलसिला फरवरी 2022 में शुरू हुआ, जब रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप ने रूसी तेल पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद रूस ने एशियाई बाजारों, खासकर भारत और चीन, पर ध्यान केंद्रित किया। 2021 में भारत के तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी मात्र 0.2% थी, जो 2025 में बढ़कर लगभग 37% हो गई। भारत को इससे प्रत्यक्ष रूप से 2023-24 में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत हुई, हालांकि शुरुआती 30 डॉलर प्रति बैरल की छूट अब घटकर 3-6 डॉलर रह गई है।
रूस के साथ कई भारतीय कंपनियों के लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट भी हैं। दिसंबर 2024 में रिलायंस ने रूस से रोजाना 5 लाख बैरल तेल खरीदने के लिए 10 साल का समझौता किया। इन समझौतों को तुरंत समाप्त करना संभव नहीं है। इसके अलावा, रूस से आयात बंद करने पर वैश्विक आपूर्ति घटेगी और तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं—जैसा मार्च 2022 में हुआ था, जब कीमतें 137 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में भारत पर 50% टैरिफ लगाया और इसका कारण रूस से तेल खरीद को बताया। उनका आरोप है कि भारतीय रिफाइनरी कंपनियां रूसी तेल को प्रोसेस कर यूरोप और अन्य देशों में बेचती हैं। भारत ने इस कदम को “अनुचित और अव्यवहारिक” करार दिया और पश्चिमी देशों के दोहरे रवैये को उजागर किया। भारत का तर्क है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ खुद रूस के साथ अरबों डॉलर का व्यापार कर रहे हैं—जैसे कि प्राकृतिक गैस, उर्वरक, पैलेडियम और अन्य उत्पादों का आयात।
भारत का कहना है कि रूस से तेल आयात राष्ट्रीय ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखने के लिए है। रूस से मिलने वाले सस्ते कच्चे तेल के विकल्प भी सीमित हैं—भारत पहले से ही इराक, सऊदी अरब, अमेरिका, नाइजीरिया, अबू धाबी और लैटिन अमेरिकी देशों से तेल आयात कर रहा है, लेकिन इन स्रोतों से तेल महंगा पड़ता है।
इस पूरे परिदृश्य में स्पष्ट है कि रूस से सस्ते तेल का आर्थिक फायदा फिलहाल सरकार और कंपनियों तक सीमित है, जबकि आम जनता तक इसका असर ईंधन की कीमतों में कमी के रूप में नहीं पहुंच पाया है। सवाल यही है कि कब और कैसे यह बचत आम उपभोक्ताओं की जेब तक पहुंचेगी।