शंभू बॉर्डर पर क्यों नहीं बन पाया किसानों का स्थायी मोर्चा? प्रशासन की रणनीति, बातचीत और तैयारी ने कैसे बदला पूरा घटनाक्रम

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भारत-अमेरिका के प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के विरोध में पंजाब के विभिन्न किसान संगठनों ने दिल्ली की ओर कूच करने की घोषणा की थी। इसी योजना के तहत बड़ी संख्या में किसान शंभू बॉर्डर की ओर बढ़े, लेकिन हरियाणा प्रशासन ने पहले से सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करते हुए बॉर्डर पर मल्टी-लेयर बैरिकेडिंग, अतिरिक्त पुलिस बल और प्रशासनिक निगरानी की व्यवस्था कर दी। हालांकि इस बार स्थिति पहले जैसी टकरावपूर्ण नहीं बनी। किसानों और प्रशासन के बीच लगातार संवाद चलता रहा, जिसके चलते कई घंटों तक चली बातचीत के बाद किसान संगठनों ने दिल्ली कूच स्थगित करने का निर्णय लिया। इसके बाद किसान शांतिपूर्वक वापस लौट गए और राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात भी सामान्य कर दिया गया।

इस पूरे घटनाक्रम की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इस बार प्रशासन ने केवल सुरक्षा व्यवस्था पर ही जोर नहीं दिया, बल्कि शुरुआत से ही बातचीत को प्राथमिकता दी। किसान नेताओं के शंभू बॉर्डर पहुंचते ही प्रशासनिक अधिकारियों ने उनसे मुलाकात की और उनकी मांगों को विस्तार से सुना। अधिकारियों ने मौके पर ही स्थिति को संभालने की कोशिश की और किसी भी प्रकार के तनाव या टकराव की संभावना को कम करने के लिए लगातार संवाद बनाए रखा। इससे किसानों को यह भरोसा मिला कि उनकी बात सीधे सरकार तक पहुंचाई जा रही है और उनकी मांगों पर विचार किया जा रहा है।

हरियाणा सरकार ने इस बार अपनी रणनीति में कई ऐसे बदलाव किए, जो पहले के आंदोलन के दौरान देखने को नहीं मिले थे। अधिकारियों को पहले से निर्देश दिए गए कि किसानों के साथ संयमित और सकारात्मक व्यवहार रखा जाए। प्रशासन ने किसी भी प्रकार की उकसाने वाली कार्रवाई से दूरी बनाई और शुरुआत से ही वार्ता का रास्ता अपनाया। यही कारण रहा कि माहौल शांत बना रहा और किसी भी स्तर पर बड़े टकराव की स्थिति पैदा नहीं हुई। प्रशासन की इस रणनीति ने किसानों और पुलिस के बीच विश्वास बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बातचीत के दौरान किसानों ने अपनी प्रमुख मांगों को प्रशासन के सामने रखा। इनमें हिरासत में लिए गए किसान नेताओं की रिहाई और केंद्रीय कृषि मंत्री के साथ बैठक सुनिश्चित करने जैसी मांगें प्रमुख थीं। प्रशासन ने इन मांगों को संबंधित स्तर तक तुरंत पहुंचाया और सरकार की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने आई। किसानों को भरोसा दिया गया कि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई होगी और केंद्र स्तर पर भी वार्ता का अवसर उपलब्ध कराया जाएगा। इस आश्वासन ने पूरे घटनाक्रम की दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई।

इस बार किसानों की रणनीति भी पहले के आंदोलनों से अलग दिखाई दी। बड़ी संख्या में किसान बसों और छोटे वाहनों के जरिए शंभू बॉर्डर पहुंचे थे, जबकि लंबे समय तक धरना देने के लिए आवश्यक संसाधन उनके पास मौजूद नहीं थे। उनके साथ ट्रैक्टर-ट्रॉलियां, टेंट, रसोई की व्यवस्था, राशन और अन्य आवश्यक सामान पहले की तरह नहीं था। इससे यह संकेत भी मिला कि उनका प्राथमिक उद्देश्य अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाना था, न कि तत्काल स्थायी मोर्चा स्थापित करना। यही कारण रहा कि बातचीत सफल होने के बाद आंदोलन को आगे बढ़ाने की बजाय वापस लौटने का फैसला लिया गया।

पिछले किसान आंदोलन की तुलना में इस बार प्रशासनिक रवैये में स्पष्ट अंतर देखने को मिला। पहले जहां सुरक्षा बलों और किसानों के बीच कई बार तनावपूर्ण हालात बने थे, वहीं इस बार अधिकारियों ने शुरुआत से ही संवाद बनाए रखा। किसानों को रोकने के लिए केवल सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित रहने की बजाय उनकी बात सुनने और समाधान तलाशने का प्रयास किया गया। इससे स्थिति नियंत्रण में रही और किसी भी प्रकार की हिंसक झड़प या बड़े विवाद की नौबत नहीं आई।

किसान नेताओं ने भी बातचीत के बाद सार्वजनिक रूप से कहा कि प्रशासन का व्यवहार इस बार पहले की तुलना में अधिक सहयोगात्मक और शांतिपूर्ण रहा। उनका कहना था कि अधिकारियों ने लगातार संपर्क बनाए रखा और किसी भी प्रकार की कठोर कार्रवाई करने के बजाय समाधान निकालने पर जोर दिया। इसी कारण किसानों ने भी संयम बनाए रखा और किसी तरह के टकराव से बचते हुए बातचीत को प्राथमिकता दी। दोनों पक्षों के बीच संवाद की यह प्रक्रिया पूरे घटनाक्रम की सबसे अहम कड़ी साबित हुई।

सरकार की ओर से किसानों को यह भी आश्वासन दिया गया कि उनकी प्रमुख मांगों पर संबंधित मंत्रालय के स्तर पर जल्द चर्चा कराई जाएगी। साथ ही हिरासत में लिए गए किसान नेताओं को लेकर भी सकारात्मक कार्रवाई की गई। इन कदमों के बाद किसान संगठनों ने इसे अपनी शुरुआती सफलता माना और आगे की रणनीति तय करने के लिए आंदोलन को फिलहाल स्थगित करने का फैसला लिया। इससे शंभू बॉर्डर पर लंबे समय तक धरना देने की संभावना स्वतः समाप्त हो गई और स्थिति सामान्य होने लगी।

कई घंटों तक चली वार्ता और प्रशासनिक प्रयासों के बाद किसानों ने शांतिपूर्ण तरीके से वापस लौटने की घोषणा कर दी। इसके साथ ही हरियाणा प्रशासन ने भी सुरक्षा व्यवस्था को चरणबद्ध तरीके से सामान्य किया और राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात बहाल कर दिया। पूरे घटनाक्रम ने यह संकेत दिया कि संवाद, संयम और समय पर लिए गए प्रशासनिक निर्णय कई बार ऐसे आंदोलनों को बिना किसी बड़े टकराव के भी संभाल सकते हैं। इस बार शंभू बॉर्डर पर स्थायी मोर्चा नहीं बन पाने के पीछे प्रशासनिक रणनीति, किसानों की सीमित तैयारी, प्रमुख मांगों पर मिले आश्वासन और लगातार जारी बातचीत जैसे कई महत्वपूर्ण कारण एक साथ काम करते हुए दिखाई दिए।