जिला न्यायाधीशों की रिटायरमेंट आयु बढ़ाने पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संकेत, राज्यों और हाईकोर्ट से मांगा विस्तृत जवाब

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सुप्रीम कोर्ट ने जिला न्यायपालिका से जुड़े अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाने की मांग पर सुनवाई करते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि इस विषय पर कोई भी निर्णय लेने से पहले संबंधित राज्य सरकारें अपने-अपने हाईकोर्ट से विचार-विमर्श करें और उसके बाद अपना स्पष्ट रुख अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें। न्यायपालिका से जुड़े इस मुद्दे को व्यापक महत्व का बताते हुए कोर्ट ने सभी पक्षों से समयबद्ध जवाब देने को कहा है।

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन राज्यों में राज्य सरकार और संबंधित हाईकोर्ट दोनों इस प्रस्ताव पर सहमत होंगे, वहां न्यायिक अधिकारियों को 1 अप्रैल 2026 से 61 वर्ष की आयु तक सेवा में बनाए रखने की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि अदालत ने यह भी साफ किया कि यह व्यवस्था केवल अंतरिम रूप से लागू होगी और मामले में अंतिम निर्णय आने के बाद ही इसे स्थायी रूप दिया जाएगा। अंतिम आदेश के अनुसार आगे की स्थिति तय होगी।

यह मामला उस याचिका के आधार पर अदालत के समक्ष आया है जिसमें पूरे देश की जिला न्यायपालिका के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष किए जाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि न्यायिक अधिकारियों के लंबे अनुभव और उनकी विशेषज्ञता का लाभ न्यायपालिका को अधिक समय तक मिलना चाहिए, जिससे अदालतों की कार्यप्रणाली और अधिक प्रभावी बन सके।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि राज्यों और हाईकोर्ट की राय इस विषय में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए सभी राज्य सरकारों को अपने-अपने अधिकार क्षेत्र वाले हाईकोर्ट से औपचारिक परामर्श करने के बाद ही अपना पक्ष अदालत के समक्ष रखना होगा। अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया कि सभी संबंधित पक्ष निर्धारित समयसीमा के भीतर अपनी प्रतिक्रिया प्रस्तुत करें ताकि मामले की सुनवाई आगे बढ़ाई जा सके।

अदालत ने निर्देश दिया कि सभी राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश दो सप्ताह के भीतर अपना आधिकारिक रुख रिकॉर्ड पर दाखिल करें। इसके साथ ही संबंधित हाईकोर्ट को भी इसी अवधि के अंदर अपना विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है। अदालत का उद्देश्य है कि सभी पक्षों की राय प्राप्त होने के बाद इस विषय पर व्यापक और संतुलित विचार किया जा सके।

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाने का मुद्दा केवल सेवा अवधि तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध न्यायपालिका की कार्यक्षमता, अनुभवी अधिकारियों की उपलब्धता और लंबित मामलों के प्रभावी निस्तारण से भी जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि अदालत इस विषय पर सभी संबंधित संस्थाओं का दृष्टिकोण जानना चाहती है, ताकि किसी भी निर्णय का व्यापक प्रभाव समझा जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फिलहाल किसी भी राज्य में सेवानिवृत्ति आयु स्वतः नहीं बढ़ेगी। केवल उन राज्यों में 61 वर्ष तक सेवा जारी रखने की अनुमति मिलेगी जहां राज्य सरकार और संबंधित हाईकोर्ट दोनों इस प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त करेंगे। इसके अलावा यह पूरी व्यवस्था न्यायालय के अंतिम फैसले के अधीन रहेगी और अंतिम निर्णय के बाद आवश्यकतानुसार इसमें बदलाव भी संभव होगा।

मामले की सुनवाई कर रही पीठ ने इस विषय को राष्ट्रीय महत्व का बताते हुए सभी पक्षों से सहयोग की अपेक्षा जताई। अदालत का मानना है कि न्यायिक व्यवस्था से जुड़े ऐसे मामलों में सभी हितधारकों की राय लेना आवश्यक है ताकि भविष्य में लिया गया फैसला न्यायपालिका और प्रशासन दोनों के लिए व्यावहारिक तथा संतुलित साबित हो।

यदि सभी राज्यों और हाईकोर्ट से समय पर जवाब प्राप्त हो जाते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट अगली सुनवाई में प्राप्त सुझावों और प्रतिक्रियाओं का विस्तृत परीक्षण करेगा। इसके बाद यह तय किया जाएगा कि न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु में बदलाव से संबंधित मांग पर आगे किस प्रकार का अंतिम निर्णय लिया जाए। इस प्रक्रिया के दौरान सभी संवैधानिक और प्रशासनिक पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाएगा।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केवल राज्यों और हाईकोर्ट से उनकी राय मांगी है तथा जहां दोनों पक्ष सहमत होंगे वहां 1 अप्रैल 2026 से न्यायिक अधिकारियों को 61 वर्ष की आयु तक सेवा जारी रखने की अंतरिम अनुमति देने का संकेत दिया है। वहीं पूरे देश में सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष करने की मांग पर अंतिम फैसला अभी आना बाकी है और यह मामला सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन है।