दिव्यांगता पर ताने सुनने वाला झंडू बना देश का गौरव, कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में पैरा पावरलिफ्टिंग का ब्रॉन्ज जीत रचा इतिहास

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कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के लिए पैरा पावरलिफ्टिंग का कांस्य पदक जीतने वाले बिहार के खिलाड़ी झंडू कुमार की सफलता केवल एक मेडल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, आत्मविश्वास और परिवार के अटूट विश्वास की ऐसी कहानी है जिसने लाखों लोगों को प्रेरित किया है। बचपन में दिव्यांगता के कारण उन्हें कई तरह के ताने सुनने पड़े और लोग उनके नाम का मजाक उड़ाते रहे, लेकिन उन्होंने कभी इन बातों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने सपनों का पीछा जारी रखा और आखिरकार अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का तिरंगा ऊंचा कर दिखाया। इस उपलब्धि ने साबित कर दिया कि मजबूत इरादों के सामने कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती।

मुकाबले से पहले झंडू कुमार ने अपने परिवार से व्हाट्सऐप कॉल पर बात की थी। उस समय उनकी मां कमला देवी ने बेटे को आशीर्वाद देते हुए कहा कि अब जब वह इतने बड़े मंच तक पहुंच चुके हैं तो देश के लिए तिरंगा जरूर फहराकर लौटें और पहले, दूसरे या तीसरे स्थान में से कोई भी स्थान हासिल करें। मां के इन शब्दों ने झंडू के अंदर नया आत्मविश्वास भर दिया। मुकाबला खत्म होने के बाद सबसे पहला फोन भी उन्होंने अपनी मां को ही किया और भावुक होकर बताया कि उनके आशीर्वाद से वह भारत के लिए पदक जीतने में सफल रहे। यह पल पूरे परिवार के लिए गर्व और खुशी से भरा हुआ था।

झंडू कुमार के बड़े भाई कुंदन कुमार ने बताया कि परिवार के सभी सदस्य पूरे उत्साह के साथ उनके मुकाबले का इंतजार कर रहे थे। पहले जानकारी मिली थी कि प्रतियोगिता रात करीब दस बजे शुरू होगी, इसलिए सभी ने जल्दी भोजन कर लिया था ताकि एक साथ बैठकर मुकाबला देख सकें। हालांकि कार्यक्रम में देरी होने के कारण प्रतियोगिता देर रात लगभग दो बजे शुरू हुई। इसके बावजूद किसी ने नींद नहीं ली और पूरा परिवार टीवी के सामने बैठा रहा। जैसे ही झंडू ने अपनी पहली सफल लिफ्ट पूरी की, पूरे घर में खुशी का माहौल बन गया और हर किसी को विश्वास हो गया कि वह पदक की दौड़ में मजबूती से बने हुए हैं।

प्रतियोगिता के दौरान झंडू कुमार ने शानदार प्रदर्शन करते हुए अपनी ताकत और आत्मविश्वास का परिचय दिया। पहली सफल कोशिश के बाद उनका आत्मविश्वास लगातार बढ़ता गया और दूसरी बड़ी लिफ्ट पूरी होते ही परिवार को एहसास हो गया कि अब पदक लगभग तय हो चुका है। घर में मौजूद सभी लोग खुशी से झूम उठे और तालियों की गूंज सुनाई देने लगी। उनके माता-पिता को जब परिवार के अन्य सदस्यों ने बताया कि झंडू ने भारत के लिए कांस्य पदक सुनिश्चित कर लिया है तो उनकी आंखों में खुशी के आंसू आ गए। वर्षों की मेहनत और संघर्ष आखिरकार रंग ला चुका था।

मेडल जीतने के बाद झंडू कुमार के गांव और आसपास के इलाके में जश्न जैसा माहौल बन गया। अगले ही दिन जब उनके बड़े भाई सब्जी की दुकान पर पहुंचे तो रास्ते भर लोग उन्हें रोककर बधाई देने लगे। जो लोग पहले मजाक में उन्हें अलग-अलग नामों से बुलाते थे, वही अब सम्मान के साथ झंडू कुमार की उपलब्धि पर गर्व व्यक्त कर रहे थे। परिवार के मोबाइल फोन लगातार बजते रहे और रिश्तेदारों, दोस्तों, खिलाड़ियों तथा स्थानीय लोगों ने शुभकामनाएं देकर इस सफलता का उत्सव मनाया। यह सम्मान पूरे परिवार के लिए किसी सपने के सच होने जैसा था।

झंडू कुमार बिहार के नालंदा जिले के हरनौत प्रखंड स्थित सबनौह डीह गांव के रहने वाले हैं। वह एक साधारण परिवार से आते हैं जहां आर्थिक स्थिति हमेशा चुनौतीपूर्ण रही है। उनके माता-पिता हरनौत बाजार में सड़क किनारे आलू और प्याज बेचकर पूरे परिवार का पालन-पोषण करते हैं। झंडू बचपन से ही पढ़ाई के साथ अपने माता-पिता की मदद भी करते थे और दुकान पर हाथ बंटाते थे। चार वर्ष की उम्र में पोलियो होने के कारण उनके शरीर का निचला हिस्सा प्रभावित हो गया, लेकिन उन्होंने कभी अपनी दिव्यांगता को अपने सपनों के बीच नहीं आने दिया। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने लगातार मेहनत जारी रखी और खेल को अपना भविष्य बनाया।

खेल के प्रति झंडू कुमार का जुनून धीरे-धीरे उन्हें पावरलिफ्टिंग की दुनिया तक ले गया। शुरुआत में स्थानीय स्तर पर अभ्यास करने के बाद उन्हें बेहतर प्रशिक्षण मिलने लगा और उनकी प्रतिभा लगातार निखरती गई। वर्ष 2019 से उनके कोच और मार्गदर्शकों ने उनकी तकनीक को बेहतर बनाने के लिए लगातार मेहनत की। बाद में उनका चयन स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र में हुआ, जहां उन्हें अनुभवी प्रशिक्षकों और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों के मार्गदर्शन में अभ्यास करने का अवसर मिला। यही प्रशिक्षण उनके करियर का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ और उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए खुद को पूरी तरह तैयार किया।

झंडू कुमार के पिता रामानंद पासवान का कहना है कि उनके लिए बेटे का कॉमनवेल्थ गेम्स तक पहुंचना ही किसी बड़े सम्मान से कम नहीं था। उनका मानना है कि शारीरिक दिव्यांगता के बावजूद झंडू ने कभी हार नहीं मानी और हर चुनौती का डटकर सामना किया। वहीं उनकी मां कमला देवी हमेशा बेटे का हौसला बढ़ाती रहीं और हर प्रतियोगिता से पहले उसे जीत का आशीर्वाद देती थीं। परिवार ने आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद कभी उसके सपनों को नहीं रोका, बल्कि हर संभव सहयोग दिया। आज उसी विश्वास और मेहनत का परिणाम है कि उनका बेटा अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के लिए पदक जीतकर लौटा है।

मेडल जीतने के बाद झंडू कुमार ने अपनी खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि उनका एकमात्र लक्ष्य भारत के लिए पदक जीतना था और कांस्य पदक हासिल करने के बाद उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है जैसे वह हवा में उड़ रहे हों। उन्होंने अपनी इस उपलब्धि का श्रेय अपने माता-पिता, कोच, प्रशिक्षण देने वाले सभी विशेषज्ञों और उन लोगों को दिया जिन्होंने कठिन समय में उनका साथ नहीं छोड़ा। झंडू ने कहा कि यह उनकी शुरुआत है और भविष्य में वह इससे भी बेहतर प्रदर्शन कर देश के लिए बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्वर्ण पदक जीतने का सपना पूरा करने की पूरी कोशिश करेंगे। उनकी संघर्षभरी यात्रा आज उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी है जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने लक्ष्य को हासिल करने का साहस रखते हैं।