सिर्फ वोटर लिस्ट में पति-पत्नी के तौर पर नाम दर्ज हो जाने से किसी रिश्ते को कानूनी रूप से वैध विवाह नहीं माना जा सकता। एक अहम फैसले में हाईकोर्ट ने साफ किया कि हिंदू विवाह की वैधता साबित करने के लिए सिर्फ सरकारी दस्तावेज या रिकॉर्ड पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए कानून में तय जरूरी रीति-रिवाज और रस्में पूरी होना भी जरूरी है।
मामला एक ऐसी महिला से जुड़ा था, जिसने अपने पति की मृत्यु के बाद परिवार की सहमति से देवर के साथ हिंदू रीति-रिवाज से विवाह होने का दावा किया था। महिला का कहना था कि शादी के बाद कुछ समय तक सब ठीक रहा, लेकिन बाद में उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और घर से निकाल दिया गया। इसके बाद उसने अदालत में भरण-पोषण की मांग की थी।
निचली अदालत में महिला को भरण-पोषण देने का आदेश भी दिया गया था। बाद में कथित पति ने इस फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि दोनों के बीच कानूनी रूप से कोई विवाह हुआ ही नहीं था। मामला आगे बढ़ा और अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों, गवाहों के बयानों और विवाह से जुड़े सबूतों की जांच की।
महिला की ओर से यह दलील दी गई कि उसके पास ऐसे दस्तावेज मौजूद हैं, जिनमें कथित पति का नाम पति के रूप में दर्ज था। इसी आधार पर महिला ने दावा किया कि दोनों के बीच वैवाहिक संबंध को स्वीकार किया जाना चाहिए। लेकिन अदालत ने माना कि किसी सरकारी रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना अपने आप में विवाह की वैधता का निर्णायक प्रमाण नहीं है।
अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह कानून के तहत विवाह को मान्यता देने के लिए जरूरी रीति-रिवाजों का पालन होना चाहिए। मामले में महिला यह स्पष्ट रूप से साबित नहीं कर सकी कि कथित विवाह किस तारीख और स्थान पर हुआ था और उस दौरान कौन-कौन सी धार्मिक रस्में पूरी की गई थीं।
फैसले में यह भी सामने आया कि विवाह के दौरान मौजूद बताए गए गवाह कथित रस्मों के बारे में ठोस जानकारी नहीं दे सके। खास तौर पर सप्तपदी यानी सात फेरे और सिंदूरदान जैसी महत्वपूर्ण रस्मों के संबंध में पर्याप्त प्रमाण सामने नहीं आया। अदालत ने इन्हीं कमियों को विवाह की वैधता साबित न होने का अहम आधार माना।
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 का उल्लेख करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह संबंधित पक्षों के प्रचलित रीति-रिवाजों और रस्मों के अनुसार होना चाहिए। जिन समुदायों में सप्तपदी विवाह की आवश्यक रस्म है, वहां सात फेरे पूरे किए जाने का महत्व भी है। केवल कागजी रिकॉर्ड से विवाह की वैधता स्थापित नहीं की जा सकती।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भरण-पोषण से जुड़े किसी पुराने आदेश का मतलब यह नहीं है कि उस आदेश से विवाह की कानूनी वैधता भी साबित हो गई। भरण-पोषण की कार्यवाही और विवाह की वैधता दो अलग-अलग कानूनी सवाल हैं। इसलिए पहले किसी अदालत द्वारा भरण-पोषण दिए जाने का आदेश बाद में विवाह की वैधता का अंतिम प्रमाण नहीं बन जाता।
सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने भी माना कि हिंदू विवाह केवल प्रमाणपत्र या रजिस्ट्रेशन की औपचारिकता नहीं है। विवाह की मूल रस्में पूरी होना जरूरी है। मैरिज सर्टिफिकेट या रजिस्ट्रेशन किसी पहले से हुए विवाह का रिकॉर्ड और सबूत हो सकता है, लेकिन अगर कानून के मुताबिक मूल विवाह संस्कार ही नहीं हुआ है, तो केवल रजिस्ट्रेशन से विवाह वैध नहीं हो जाता।
इस पूरे फैसले से साफ है कि हिंदू विवाह की कानूनी मान्यता के लिए सिर्फ वोटर लिस्ट, पहचान पत्र, मैरिज सर्टिफिकेट या किसी सरकारी रिकॉर्ड पर निर्भर नहीं किया जा सकता। विवाह किस तरह हुआ, कौन-सी जरूरी रस्में पूरी हुईं और उनके पर्याप्त सबूत मौजूद हैं या नहीं, इन बातों का भी महत्व है। इसलिए शादी को कानूनी रूप से सुरक्षित रखने के लिए संबंधित रीति-रिवाजों का पालन और विवाह से जुड़े उचित दस्तावेज संभालकर रखना बेहद महत्वपूर्ण है।

