भारत ने अंतरिक्ष निगरानी के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। देश ने एक नए अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में भेजा है। इसे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से GSLV-F17 रॉकेट की मदद से लॉन्च किया गया।
यह सैटेलाइट करीब 36 हजार किलोमीटर की ऊंचाई पर जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में काम करेगा। इतनी ऊंचाई पर रहकर यह भारत और आसपास के बड़े क्षेत्रों की लगातार तस्वीरें लेने में सक्षम होगा। इससे जमीन पर होने वाले बदलावों की निगरानी पहले की तुलना में अलग तरीके से की जा सकेगी।
इस मिशन की सबसे खास बात इसकी कक्षा है। इससे पहले भारत के अधिकांश इमेजिंग सैटेलाइट निचली कक्षा में काम करते रहे हैं, जहां वे पृथ्वी के किसी इलाके के ऊपर सीमित समय के लिए ही रह पाते हैं। नई कक्षा में सैटेलाइट पृथ्वी के घूमने के साथ तालमेल बनाए रखते हुए बड़े क्षेत्र पर लगातार नजर रखने में मदद करेगा।
इस क्षमता का इस्तेमाल रणनीतिक और संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी में भी किया जा सकता है। भारत और आसपास के इलाकों की लगातार तस्वीरें मिलने से सीमावर्ती क्षेत्रों में होने वाले बदलावों पर नजर रखने में मदद मिलेगी। खास तौर पर देश की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था के लिए यह क्षमता महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
सैटेलाइट का इस्तेमाल केवल सुरक्षा से जुड़ी निगरानी तक सीमित नहीं रहेगा। इसका एक बड़ा उपयोग प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी में भी किया जाएगा। बाढ़, चक्रवात, भारी बारिश और जंगल की आग जैसी घटनाओं पर नजर रखने में इससे मदद मिल सकती है।
आपदा के दौरान समय पर मिलने वाली तस्वीरें और डेटा राहत एवं बचाव कार्यों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। किसी प्रभावित इलाके में पानी फैलने, मौसम से हुए बदलाव या नुकसान का आकलन तेजी से करने में भी सैटेलाइट से प्राप्त जानकारी मददगार साबित हो सकती है।
इसमें दो मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजर लगाए गए हैं। ये कैमरे धरती की तस्वीरें अलग-अलग प्रकाश तरंगों में लेते हैं। इससे केवल सामान्य तस्वीरें ही नहीं, बल्कि जमीन, वनस्पति, पानी और पर्यावरण में होने वाले बदलावों की जानकारी भी हासिल की जा सकती है।
इस सैटेलाइट की खासियत बेहद छोटी वस्तुओं की बहुत बारीक तस्वीर लेना नहीं है, बल्कि बहुत बड़े क्षेत्र की बार-बार तस्वीरें उपलब्ध कराना है। इसके एक इमेजर की रिजॉल्यूशन करीब 42 मीटर प्रति पिक्सल बताई गई है, यानी प्रत्येक पिक्सल जमीन के लगभग 42×42 मीटर क्षेत्र की जानकारी देता है।
रॉकेट से उड़ान भरने के करीब 18 मिनट बाद सैटेलाइट को सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में पहुंचाया गया। इसके बाद इसे अपनी अंतिम करीब 36 हजार किलोमीटर वाली कक्षा तक पहुंचाया जाना है। यह मिशन भारत के जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल कार्यक्रम की 19वीं उड़ान भी है।
यह मिशन ऐसे समय में आया है जब पिछले कुछ अंतरिक्ष अभियानों में तकनीकी चुनौतियां सामने आई थीं। इससे पहले एक इमेजिंग सैटेलाइट को जियोस्टेशनरी ऑर्बिट से भारतीय उपमहाद्वीप की लगभग रियल टाइम इमेजिंग के उद्देश्य से तैयार किया गया था, लेकिन वह मिशन सफल नहीं हो पाया था। नए मिशन की सफलता को बड़े क्षेत्रों की निगरानी और आपदा प्रबंधन की क्षमता बढ़ाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

